सुधी पाठकों ! वेद-सार में संस्कृत में लिखे मंत्र वेदों और वेदों पर आधारित पुस्तकों से लिए गए हैं .फिर भी ट्रांस लिट्रेसन के कारण छोटी मोटी त्रुटि संभव है . वेद मन्त्रों के अर्थ संस्कृत के बड़े बड़े विद्वानों द्वारा किये गए अर्थ का ही अंग्रेजीकरण है . हिंदी की कविता मेरा अपना भाव है जो शब्दशः अनुवाद न होकर काव्यात्मक रूप से किया गया भावानुवाद है . इस लिए पाठक इस ब्लॉग को ज्ञान वर्धन का साधन मानकर ही आस्वादन करें . हार्दिक स्वागत और धन्यवाद .



Thursday, May 19, 2011

श्रद्धा

औम श्रध्यया अग्निः सभिध्यते , श्रध्यया हूयते हविः I 
श्रद्धा भगस्य मूर्धनि वचसा वेदयामसि II 
(ऋग. १०/१५१/१)
  
Agni , the fire is enkindled by Shraddha - the faith . Agni is the inner commitment , the entusiasm to do something that burns like fire in the heart of a man of faith , prompting him to dedicate his life for a noble cause . Faith is oblation of personal sacrifice offered in the Great yajna , one makes for one's religion or country or ideal . Faith is at the head of success or achievement in life. Even the hardest situations are handled with faith within and God over head .
 
कोई लाग लगी हो मन में वह श्रद्धा है 
कोई आग लगी हो मन में वह श्रद्धा है
 
जब काम कोई अपना लेता मानव मन
उसको करने में झोंक डालता तन मन
वह उसका दीवानापन ही श्रद्धा है
 
श्रद्धा से ही तो भाग्य बदल जाता है
श्रद्धा से ही इतिहास लिखा जाता है
मन का गहरा विश्वास ही तो श्रद्धा है
 
कुछ पाने को कुछ कर जाने की इच्छा
पाने की खातिर मर जाने की इच्छा
ऐसी मन की इच्छा ही तो श्रद्धा है

Wednesday, May 18, 2011

अन्न स्तुति

औम् अन्न्पतेअन्न्स्यनो देहयान मीवस्य शुष्मिणः I 
प्र प्र दातारं तारिष ऊर्ज नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे II 
 
O God ! The provider of grains ! You bless us with such grains , which may keep us free from diseases and make us healthier and stronger . We pray the same for our animals too .
 
तेरी कृपा से जन्म यह 
तेरी कृपा का अन्ना यह 
हमको मिले यूँ ही सदा 
जीवन चले यूँ ही सदा
 
इस अन्न में वो शक्ति है 
इस शक्ति में वो भक्ति है
जो रोग करके दूर सब 
देती है सारे सुख सदा
 
तेरी कृपा की छाँव में 
तेरे निराले गाँव में
इंसान तो इंसान हैं 
पशु को भी मिलता बल सदा